तेजी से बढ़ रही है आईवीएफ और सरोगेसी केंद्रों की संख्या; सरकारी अनुमति देने की प्रक्रिया ठप!
मुंबई : राज्य में आईवीएफ और सरोगेसी केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इन केंद्रों को सरकारी अनुमति देने की प्रक्रिया ठप पड़ी है। नतीजा यह है कि कई केंद्र बिना आधिकारिक परमिट के ही कृत्रिम गर्भाधान से जुड़ी चिकित्सा प्रक्रियाएं चुपचाप चला रहे हैं। यह गंभीर वास्तविकता अब सामने आने लगी है और इससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सरकार के निर्देशानुसार, राज्यभर के आईवीएफ केंद्रों ने पंजीकरण या नवीनीकरण के लिए एक से दो लाख रुपए तक का शुल्क जमा किया है। यह शुल्क केंद्रों में उपलब्ध चिकित्सा तकनीक और सुविधाओं के आधार पर लिया गया है। बावजूद इसके अनुमति की फाइलें सरकारी दफ्तरों में ही अटकी हुई हैं। दो साल बीत जाने के बाद भी कई केंद्रों को अधिकृत परमिट नहीं मिल पाया है। इस बीच बदलापुर में सामने आए एग सेल यानी स्त्रीबीज बिक्री कांड ने पूरे तंत्र को झकझोर दिया है। इस मामले में शामिल डॉक्टरों और बिचौलियों पर कार्रवाई के बाद सरकार ने अन्य आईवीएफ केंद्रों की जांच का रुख अपनाया है। सरकार का यह कदम स्वागत योग्य माना जा रहा है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि पहले सरकार को अपनी ही देरी पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। विशेषज्ञों का सवाल है कि जब केंद्रों ने नियमानुसार आवेदन किया, भारी शुल्क जमा किया और आधुनिक उपकरणों पर करोड़ों रुपए खर्च किए, तो फिर अनुमति देने में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या कृत्रिम गर्भाधान से जुड़ी तकनीकों और नियमों की कानूनी जांच अब तक पूरी नहीं हुई है? यह भी एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
बदलापुर प्रकरण के बाद यह भी उजागर हुआ कि इस क्षेत्र में दलालों और बिचौलियों का एक नेटवर्क सक्रिय है। ऐसे में यह भी मांग उठ रही है कि मुंबई सहित राज्य के अन्य शहरों में संचालित तथाकथित हाई-प्रोफाइल और सेलिब्रिटी आईवीएफ केंद्रों की भी कड़ी जांच होनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि वहां नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।
इसी संदर्भ में ‘आईवीएफ पोर्टल’ शुरू करने की मांग भी उठी थी। इस पोर्टल के जरिए यह जानकारी दर्ज की जानी थी कि किसी महिला ने कितनी बार अंडाणु दान किया है और उसकी मेडिकल स्थिति क्या है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतना महत्वपूर्ण पोर्टल आज तक शुरू नहीं हो पाया है।
जब अनुमति अटकी है, पोर्टल शुरू नहीं हुआ है और निगरानी का तंत्र अधूरा है, तो आखिर आईवीएफ केंद्रों की यह पूरी व्यवस्था किस भरोसे चल रही है? यही चिंता अब स्वास्थ्य क्षेत्र में जोर पकड़ रही है।