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  हैट्रिक लगाने की नियत से सुभाष पासी ने इस विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा का दामन थाम लिया और निषाद-भाजपा गठबंधन प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे। विधायक को भरोसा था कि भाजपा के मतों के संजोने के साथ ही अपने व्यक्तिगत संबंधों व अक्षर फाउंडेशन के कार्यों के बल पर जीत हासिल कर लेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। युवा अंकित भारती ने सपा के वोटों को तो संभाला ही लेकिन विरोधी दलों के मतों में भी सेंध लगाने में सफल रहे। जानकारों का कहना है कि सुभाष पासी क्षेत्र में कम ही दिखाई देते थे। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान मुंबई में काम करने वाले जिले के किसी भी व्यक्ति की मौत होने के बाद उनकी अक्षर संस्था शव फ्लाइट से बनारस और फिर घर तक पहुंचाने की व्यवस्था करती है। इसके अलावा हैंडपंप भी लगवाएं हैं, लेकिन उनके दस साल के विकास से जनता खुश नहीं थी।

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