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दिल्ली में फिर पहले जैसा हाल देखा जा रहा है। पूरी दिल्ली धुएं की मोटी चादर में लिपट गई है। इंडिया गेट, जो पहले कई किलोमीटर से नजर आता है, वह इन दिनों नहीं दिख रहा। सरकारें प्रदूषण को रोकने के लिए गंभीर नहीं हैं और न ही किसी की जिम्मेवारी तय कर रही हैं। विगत वर्षों से पंजाब, हरियाणा सहित पांच राज्यों को पराली जलाने के लिए कोसा जा रहा है। इस बार केंद्र सरकार को कृषि कानूनों के कारण किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, शायद यही कारण है कि पराली जलाने के लिए इस बार किसानों का कोई जिक्र नहीं हो रहा। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने भी दिल्ली में प्रदूषण के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेवार ठहराया है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी चुप है क्योंकि पंजाब में आम आदमी पार्टी किसानों के समर्थन में खड़ी है।
यह भी कारण हो सकता है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब में अपनी पार्टी के लिए मिल रही लोकप्रियता के रास्ते में रूकावट नहीं बनना चाहते लेकिन इस समस्या में पिस जरूर रहे हैं। उधर दिल्ली के आम लोग व मरीज मुश्किल से सांस ले पा रहे हैं। दिल्ली देश की राजधानी होने एवं सघन आबादी वाला महानगर होने के कारण प्रदूषण बड़ी समस्या है। जबकि राजधानी मॉडल शहर होना चाहिए, चूंकि यह देश का चेहरा व दिल है। दुख इस बात का है कि पिछले 5-7 वर्षों से दिल्ली इन दिनों गैस चेंबर बनकर नरक बन जाती है। दिल्ली में प्रदूषण के सही-सही कारण क्या हैं, इस संबंधी किसी सरकार एवं संगठन के पास कोई जवाब नहीं है।
किसी समस्या के समाधान से पहले उसके कारण जानना जरूरी है, लेकिन दिल्ली में प्रदूषण का कारण नहीं ढूँढा जा सका। हमारे देश के सरकारी विज्ञान केंद्र हैं जिन पर अरबों रुपए खर्च होता है लेकिन एक महानगर को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ठोस प्रयास नहीं हो सके। अब अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनाव प्रचार में भी अमेरिका के वातावरण की प्रशंसा करते हुए भारत को गंदा कहा है। अमेरिका की राजनीतिक संस्कृति की यह विशेषता है कि वहां वातावरण की शुद्धता को भी चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाया गया लेकिन हमारे देश में वातावरण शुद्धता का कोई मुद्दा ही नहीं है। भारतवासियों को स्वास्थ्य पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शाख बचाने के लिए अब वातावरण संरक्षण पर आवश्यक तौर पर सोचना होगा।

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